ग़स्सान कनफ़ानी कौन थे और आज भी उन्हें क्यों पढ़ा जाना चाहिए?

ग़स्सान कनफ़ानी कौन थे और आज भी उन्हें क्यों पढ़ा जाना चाहिए

1972 की एक सुबह बेरूत में एक कार में बम फटा।

उसमें बैठे थे – 36 साल के ग़स्सान कनफ़ानी। फ़िलिस्तीन के सबसे बड़े लेखक और उनकी 17 साल की भतीजी।

इज़रायली ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद ने उन्हें इसलिए मारा क्योंकि वे ख़तरनाक थे। लेकिन उनका ख़तरा बंदूक़ से नहीं था। उनका ख़तरा उनकी क़लम से था।

लेबनान के अख़बार The Daily Star ने उनके बारे में लिखा था – एक ऐसा सिपाही जिसने कभी बंदूक़ नहीं चलाई, जिसका हथियार एक बॉलपॉइंट पेन था, और जिसका मैदानअख़बार के पन्ने।

वे मारे गए, लेकिन उनके शब्द नहीं।

एक बच्चे का निर्वासनजो लेखक बना

ग़स्सान फ़ायिज़ कनफ़ानी का जन्म 1936 में अक्का में हुआ – उस वक़्त का फ़िलिस्तीन जो ब्रिटिश मेंडेट के अधीन था। पिता वकील थे, घर में पढ़ाई-लिखाई की परंपरा थी। बचपन याफ़ा में गुज़रा – एक ऐसे शहर में जो उस वक़्त अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता था।

लेकिन 1948 में सब बदल गया।

जब कनफ़ानी सिर्फ़ बारह साल के थे, नकबा के दौरान उनका पूरा परिवार फ़िलिस्तीन छोड़ने पर मजबूर हो गया। पहले लेबनान, फिर दमिश्क। एक रात में – घर, ज़मीन, बचपन  सब पीछे छूट गया। उन्होंने उस पल को बाद में अपनी आत्मकथात्मक रचना The Land of Sad Oranges में लिखा। दुख को उन्होंने कभी अपने भीतर बंद नहीं किया – उसे कहानी बना दिया।

दमिश्क में उन्होंने एक प्रिंटिंग प्रेस में काम किया, शायद वहीं से लिखने का पहला बीज पड़ा। फिर दमिश्क यूनिवर्सिटी में अरबी साहित्य पढ़ा और वहीं छोटी-छोटी कहानियाँ लिखनी शुरू कीं। एक साहित्यिक समाज से जुड़े और उनकी एक ही ज़िद थी कि उनकी कहानियाँ छपनी चाहिए, क्योंकि जैसा उन्होंने कहा -“राजनीति और उपन्यास एक अविभाज्य मामला है।”

1955 में कुवैत, 1960 में बेरूत और फिर 12 साल का वह लेखन जिसने अरबी साहित्य को हमेशा के लिए बदल दिया।

वे लिखते क्या थे?

कनफ़ानी ने उपन्यास, कहानियाँ, नाटक, बच्चों की किताबें, साहित्यिक आलोचना और राजनीतिक लेखन  सब किया। और यह सब महज़ 36 साल की उम्र में।

लेकिन उनकी पहचान तीन रचनाओं से सबसे गहरी है।

पहली – Men in the Sun (1962)

तीन फ़िलिस्तीनी शरणार्थी – अलग-अलग उम्र के, अलग-अलग ज़िंदगियों के – कुवैत में काम की तलाश में निकलते हैं। एक ट्रक ड्राइवर उन्हें सीमा के पार तस्करी करने पर राज़ी होता है। उन्हें एक खाली टंकी में छुपाया जाता है। रेगिस्तान की धूप में जब ड्राइवर सीमा पर कागज़ात की औपचारिकताओं में उलझा रहता है, तीनों की मृत्यु हो जाती है।

उपन्यास का आख़िरी वाक्य – उन्होंने दस्तक क्यों नहीं दी?” , अरबी साहित्य की सबसे यादगार पंक्तियों में से एक है।

Men in the Sun में कनफ़ानी ने आधुनिकतावादी कथा तकनीक का इस्तेमाल करते हुए निर्वासन, अलगाव और राष्ट्रीय प्रतिरोध के विषयों को उठाया। लेकिन जो बात उन्हें उनके समकालीनों से अलग करती है, वह है उनकी यह क्षमता कि वे इन विषयों को मध्य-पूर्व के संदर्भ से उठाकर सार्वभौमिक बना देते हैं।

दूसरी – Returning to Haifa (1969)

1948 में एक फ़िलिस्तीनी दंपती को हाइफ़ा छोड़ना पड़ा और उनका नवजात बच्चा पीछे छूट गया। बीस साल बाद, जब सीमा खुलती है, वे वापस अपने घर जाते हैं। लेकिन उनका घर अब एक इज़रायली परिवार का घर है और उनका बच्चा, जो वहीं पला-बढ़ा, अब एक इज़रायली सैनिक है।

यह सिर्फ़ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह पहचान, ज़मीन और स्मृति की सबसे जटिल कहानी है, जो आज भी उतनी ही ज़िंदा है।

तीसरीग़ज़ा से ख़त

एक चिट्ठी, एक युवक अपने दोस्त को लिखता है जो अमेरिका जाना चाहता है। वह ख़ुद भी जाना चाहता था – लेकिन अपनी घायल भतीजी नादिया को देखने के बाद नहीं जाता। नादिया ने अपनी टाँग खोई थी – एक बम में, अपने छोटे भाई-बहनों को बचाते हुए।

कनफ़ानी लिखते हैं – वापस आ। यहाँ आकर देख कि नादिया की टाँग क्या कहती है।

यह चिट्ठी 1956 में लिखी गई थी। आज भी वह उतनी ही ज़रूरी है।

उनके लेखन में वह क्या था जो बाकियों में नहीं?

कनफ़ानी अपनी कहानियों में दर्द को सीधे नहीं कहते। वे उसे किसी प्रतीक में बदल देते हैं।

रेगिस्तान की धूप – शोषण का रूपक। एक खाली पानी की टंकी – उस चुप्पी का रूपक जो अपनी मौत का विरोध नहीं कर पाती। नादिया की टाँग – एक पूरे देश के घाव का रूपक।

अपने शुरुआती लेखन में कनफ़ानी के लिए फ़िलिस्तीन एक कारण था, एक मुद्दा। लेकिन बाद में उनके लिए फ़िलिस्तीन एक सम्पूर्ण मानवीय प्रतीक बन गया। उनकी कहानियाँ सिर्फ़ फ़िलिस्तीनियों और उनकी समस्याओं की नहीं थीं, वे फ़िलिस्तीनी के माध्यम से हर उस इंसान की कहानी थीं जो पीड़ा और वंचना में जीता है।

आज 2026 में उन्हें क्यों पढ़ें?

यह सवाल ज़रूरी है।

कनफ़ानी 1972 में मरे। उनकी कहानियाँ 1950-60 के दशक की हैं। तो क्या वे आज भी उपयुक्त हैं?

इसका जवाब है – हाँ। और यह जवाब दुखद भी है।

क्योंकि जो कनफ़ानी ने लिखा – निर्वासन, घर का खोना, एक पूरी क़ौम का विस्थापन – वह आज भी जारी है। ग़ज़ा आज भी जल रहा है। शरणार्थी शिविर आज भी भरे हैं। वह दर्द जो उन्होंने 1956 में शब्दों में उतारा  2026 में भी उतना ही ताज़ा है।

लेकिन कनफ़ानी को पढ़ने का कारण सिर्फ़ यह नहीं।

उन्हें पढ़ने का कारण यह है कि वे हमें यह सिखाते हैं कि साहित्य क्या कर सकता है।

वे हमें दिखाते हैं कि किसी भी इंसान के दर्द को चाहे वह फ़िलिस्तीन का हो या भारत का या अफ्रीका का – शब्दों में उतारकर उसे सार्वभौमिक बनाया जा सकता है। वे हमें सिखाते हैं कि प्रतिरोध सिर्फ़ हथियार से नहीं होता – एक कहानी भी दुनिया बदल सकती है।

उनकी कहानियों ने फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध साहित्य की नींव रखी और आज वे दुनिया भर के उन लेखकों के लिए प्रेरणा हैं जो अन्याय के सामने चुप नहीं रहते।


हिंदी पाठक के लिए कनफ़ानी क्यों ज़रूरी हैं?

भारत और फ़िलिस्तीन दोनों ने औपनिवेशिक शासन झेला। दोनों ने विभाजन का दर्द जाना। दोनों की साहित्यिक परंपराओं में घर, विस्थापन और पहचान के सवाल केंद्रीय हैं।

जब एक हिंदी पाठक कनफ़ानी पढ़ता है – तो उसे कहीं न कहीं मंटो याद आता है। कहीं न कहीं विभाजन की वे कहानियाँ याद आती हैं जो घर छोड़ने की पीड़ा को शब्द देती हैं।

दो अलग देश, दो अलग भाषाएँ। लेकिन एक ही मानवीय अनुभव।

यही वह क्षण है जब साहित्य अपना सबसे बड़ा काम करता है – यह बताना कि हम अकेले नहीं हैं।

एक आख़िरी बात

कनफ़ानी से एक बार पूछा गया था – आप लिखते क्यों हैं?”

उन्होंने कहा था – क्योंकि राजनीति और उपन्यास एक अविभाज्य मामला है और क्योंकि मुझे यक़ीन है कि जो मैं कह रहा हूँवह ज़रूरी है।

36 साल की उम्र में उन्हें चुप करा दिया गया।

लेकिन जो ज़रूरी था – वह आज भी कह रहे है।

ग़स्सान कनफ़ानी की कहानियाँ हिंदी में पढ़ने के लिए – ग़ज़ा से ख़त और अन्य कहानियाँ  

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