एक सवाल से शुरू करते हैं।
आपने पिछले एक साल में कितनी किताबें पढ़ीं?
अब उनमें से कितनी अरबी भाषा से आई थीं?
शायद एक भी नहीं।
और यह आपकी कमी नहीं है। यह उस व्यवस्था की कमी है जिसने हिंदी पाठक को दशकों तक यह मानने पर मजबूर किया कि “असली साहित्य” या तो अंग्रेज़ी में होता है, या रूसी में, या फ्रेंच में। अरबी दुनिया – जो करोड़ों इंसानों की भाषा है, जिसने सदियों तक दुनिया को दर्शन, कविता और कहानी दी – वह हिंदी पाठक की पहुँच से बाहर रही।
आप अरबी साहित्य से क्यों दूर रहे असली कारण
हम अक्सर सोचते हैं कि हम जो नहीं पढ़ते, वह इसलिए नहीं पढ़ते क्योंकि वह हमारे लिए नहीं है।
लेकिन सच यह है – हम वह नहीं पढ़ते जो हमारे सामने रखा ही नहीं गया।
हिंदी प्रकाशन जगत ने लंबे समय तक अरबी साहित्य को अनुवाद के लायक नहीं समझा। इसके पीछे कई कारण रहे – कॉपीराइट की जटिलताएँ, अनुवादकों की कमी, और वह पुरानी सोच कि हिंदी पाठक “भारी” या “विदेशी” विषयों में रुचि नहीं लेता।
परिणाम यह हुआ कि एक पूरी साहित्यिक परंपरा – जो प्रेम, निर्वासन, युद्ध, पहचान और प्रतिरोध की सबसे मार्मिक कहानियाँ कहती है – हिंदी पाठक की नज़र से ओझल रही।
और इस बीच वह पाठक अंग्रेज़ी अनुवादों के ज़रिए यूरोपीय साहित्य तो पढ़ता रहा, लेकिन अपने सबसे करीबी पड़ोस – अरब दुनिया की आवाज़ से अनजान रहा।
यह एक सांस्कृतिक विडंबना है।
अरबी साहित्य आपके लिए अजनबी नहीं है – बस अपरिचित है
यहाँ एक बात ध्यान से सुनिए।
अरबी साहित्य आपसे बहुत दूर नहीं है।
जो भावनाएँ उसमें हैं – घर से बिछड़ने का दर्द, किसी अपने को खो देने का शोक, अन्याय के सामने खड़े रहने की ज़िद, और फिर भी ज़िंदगी से प्यार करने की क्षमता – ये भावनाएँ किसी एक भाषा या देश की नहीं हैं।
ये मानवीय हैं।
और जब आप किसी अरबी लेखक की कहानी पढ़ते हैं, तो आप सिर्फ़ एक दूसरे देश की कहानी नहीं पढ़ रहे। आप अपने ही भीतर के किसी कोने को पहचान रहे होते हैं – जिसे आप शब्द नहीं दे पाए थे, लेकिन किसी और ने दे दिए।
यही साहित्य की ताक़त है। यही अनुवाद का चमत्कार है।
अरबी साहित्य हिंदी में क्यों आना चाहिए – सिर्फ़ एक नहीं, कई कारण हैं
पहला कारण – यह साहित्य इंसानी अनुभव का वह हिस्सा है जो हमसे छूट रहा है।
अरबी साहित्य सदियों पुरानी परंपरा है। इसने दुनिया को दर्शन दिया, गणित दिया, खगोलशास्त्र दिया। और साहित्य दिया – ऐसा साहित्य जो प्रेम, विरह, निर्वासन, प्रतिरोध और पहचान की बात इतनी गहराई से करता है कि पाठक अपनी ही ज़िंदगी उसमें देखने लगता है। जब यह हिंदी में नहीं आता, तो हम उस पूरे मानवीय अनुभव से कट जाते हैं।
दूसरा कारण – यह हमारा सबसे करीबी पड़ोस है, फिर भी सबसे अनजाना।
यूरोप की कहानियाँ हिंदी में आईं। रूस की आईं। लातिन अमेरिका की भी कुछ आईं। लेकिन अरब दुनिया – जो भौगोलिक रूप से, सांस्कृतिक रूप से, ऐतिहासिक रूप से हमसे इतनी जुड़ी हुई है – उसका साहित्य हिंदी पाठक के लिए अब भी अजनबी है। यह एक विरोधाभास है जो टूटना चाहिए।
तीसरा कारण – अरबी साहित्य की literary sensibility ही अलग है।
अरबी में दर्द को सीधे नहीं कहते। उसे किसी बिम्ब में लपेटते हैं, किसी प्रतीक में छुपाते हैं। यह एक ऐसी अभिव्यक्ति है जो हिंदी पाठक की साहित्यिक समझ को नई दिशा दे सकती है – बशर्ते वह उस तक पहुँचे।
वे आवाज़ें जो हिंदी तक नहीं पहुँचीं – अभी तक
अरबी साहित्य की दुनिया बहुत विशाल है।
नजीब महफ़ूज़ – जिन्हें 1988 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला, उन्होंने काहिरा की तंग गलियों और साधारण इंसानों की ज़िंदगी को उपन्यास में इस तरह जिलाया जैसे प्रेमचंद ने हिंदुस्तान के गाँवों को। उनकी ‘काहिरा ट्रायलॉजी’ विश्व साहित्य की सबसे बड़ी कृतियों में गिनी जाती है – लेकिन हिंदी पाठक उनसे अब तक लगभग अपरिचित है।
महमूद दरवेश – की कविताएँ पूरी दुनिया में पढ़ी जाती हैं। निर्वासन, पहचान, मातृभूमि और प्रेम पर उन्होंने जो लिखा वह किसी भी भाषा के पाठक के दिल में उतर जाता है। उनकी एक-एक पंक्ति में पूरा एक जीवन समाया हुआ है।
ग़स्सान कनफ़ानी – ने प्रतिरोध को कहानी का रूप दिया। उनकी हर पंक्ति एक राजनीतिक दस्तावेज़ भी है और एक गहरा मानवीय बयान भी। वह महज़ बीस वर्ष की उम्र में ऐसी कहानियाँ लिख रहे थे जो दशकों बाद भी उतनी ही सच और उतनी ही ज़रूरी लगती हैं।
ये नाम दुनियाभर में जाने जाते हैं।
अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश – इन सभी भाषाओं में इनके अनुवाद दशकों पहले आ चुके हैं।
हिंदी में? बहुत कम। बहुत देर से।
और यही वह खालीपन है जो हिंदी पाठक को उस पूरी दुनिया से काटता रहा – जो उसके सबसे करीब थी, भौगोलिक रूप से भी, सांस्कृतिक रूप से भी।
हिंदी और अरबी – दो भाषाएँ, एक पुरानी पहचान
एक बात और जो शायद आपने कभी इस तरह सोची न हो।
हमारी रोज़मर्रा की हिंदी में सैकड़ों अरबी शब्द हैं। किताब, क़लम, दुनिया, इंसान, वक़्त, ख़याल, मुमकिन, ज़िंदगी – ये सब अरबी से आए हैं। ये शब्द सदियों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान की निशानी हैं।
हमारी भाषाएँ पहले से जुड़ी हुई हैं। बस हमारे साहित्य अभी तक नहीं जुड़े थे।
AAS Publishers – उस खाई को पाटने की कोशिश
यहीं AAS Publishers की भूमिका आती है।
हमारा मानना है कि हिंदी पाठक को विश्व साहित्य तक पहुँचने के लिए अंग्रेज़ी की सीढ़ी नहीं चाहिए। उसे सीधे – अपनी भाषा में वह सब पढ़ने का हक़ है जो बाकी दुनिया पढ़ रही है।
अरबी साहित्य को हिंदी में लाना इसीलिए ज़रूरी है – क्योंकि यह सिर्फ़ किताबें लाना नहीं है। यह उन इंसानों की आवाज़ें लाना है जिनकी कहानियाँ हमसे मिलती-जुलती हैं , जो प्यार करते हैं, खोते हैं, लड़ते हैं, और फिर भी उम्मीद नहीं छोड़ते।
जब एक हिंदी पाठक किसी अरबी लेखक को अपनी भाषा में पढ़ता है – तो वह दो संस्कृतियों के बीच की दूरी को थोड़ा और कम कर देता है। यह पढ़ना सिर्फ़ मनोरंजन नहीं है। यह एक सांस्कृतिक संवाद है।
और संवाद से ही समझ बनती है। समझ से सहानुभूति। सहानुभूति से – एक बेहतर दुनिया की संभावना।
देर हुई – लेकिन शुरुआत हो रही है
यह परिचय देर से हो रहा है – यह सच है।
लेकिन जो नहीं हुआ उसका अफ़सोस करने से ज़्यादा ज़रूरी है – जो अभी हो सकता है, उसे होने देना।
अगर आप अरबी साहित्य को हिंदी में पढ़ना शुरू करना चाहते हैं – तो ग़ज़ा से ख़त और अन्य कहानियाँ से शुरू कीजिए।

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