फ़िलिस्तीन : युद्ध के सौ वर्ष (UPCOMING)

Rashid Khalidi (राशिद ख़ालिदी)

Translated by अक्षत और शहादत

Language: अंग्रेज़ी से अनुवाद

“जो लोग इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष की अब तक की दिशा को समझना चाहते हैं, और खुले मन से पढ़ने को तैयार हैं, उन्हें यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। यह उच्च कोटि की विद्वत्ता और अनुभव का शानदार संगम है। और अपनी स्पष्ट फ़िलिस्तीनी पक्षधरता के बावजूद संतुलित और अत्यंत पठनीय। विशेषकर अमेरिकियों और इज़रायलियों— खासकर युवा और उदार पाठकों— को इसे पढ़ना चाहिए, क्योंकि अब इस क्षेत्र के दो राष्ट्रों का भविष्य उन्हीं के हाथों में है। कृपया इसे और सौ वर्ष तक मत खिंचने दें।” — बर्नार्ड पोर्टर, Jacobin

“राशिद ख़ालिदी को फ़िलिस्तीनी जनता के महानतम जीवित इतिहासकारों में से एक के रूप में जो प्रतिष्ठा प्राप्त है, वह पूर्णतः न्यायसंगत है… इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष पर बढ़ते हुए व्यापक दृष्टिकोण के वह एक परिष्कृत और बेबाक प्रवक्ता हैं।” — Literary Review

“अद्भुत… शानदार… यह महत्वपूर्ण कृति फ़िलिस्तीनी इतिहास के साहित्य में केंद्रीय स्थान ग्रहण करेगी।” — खालिद ह्रूब, al-Quds al-Arabi

“इज़रायली-फ़िलिस्तीनी संघर्ष पर लिखी किसी भी पुस्तक की तरह इसमें बहस और विवाद की पर्याप्त गुंजाइश है। और राशिद ख़ालिदी की हर पुस्तक की तरह इसमें इतिहास, विद्वत्ता, राजनीति और गहरा जुनून मौजूद है। साथ ही उनकी यह अडिग धारणा भी कि ‘फ़िलिस्तीन में अब दो जनसमुदाय हैं, चाहे वे किसी भी तरह अस्तित्व में आए हों, और उनके बीच का संघर्ष तब तक समाप्त नहीं हो सकता जब तक एक-दूसरे के राष्ट्रीय अस्तित्व को नकारा जाता रहेगा।’” — रॉब मैली, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, International Crisis Group तथा राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में व्हाइट हाउस के मध्य-पूर्व समन्वयक

“इस पुस्तक की अनेक विशेषताओं में से एक यह है कि ख़ालिदी अपने परिवार और निजी जीवनानुभवों का उपयोग इस त्रासद, अन्यायपूर्ण कथा को बयान करने के लिए करते हैं… इज़रायल की नीतियों और ऐतिहासिक ज़ायोनवाद की उनकी आलोचना अडिग है, फिर भी समझौते के प्रश्न पर वे फ़िलिस्तीनियों से भी सीधी और स्पष्ट बात करते हैं।” — Balfour Project

“नैतिक तीव्रता और विश्लेषणात्मक कठोरता के साथ, ख़ालिदी एक लंबे और कड़वे राष्ट्रीय संघर्ष की कथा को कुशलता से उजागर करते हैं, और अनेक समयोचित, पैनी तथा मौलिक अंतर्दृष्टियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह प्रभावशाली पुस्तक अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।” — ज़ीव स्टर्नहेल, लेखक, The Anti-Enlightenment Tradition

“प्रत्यक्षदर्शी ऐतिहासिक विवरणों और गहन, प्रकाशमान विश्लेषण से भरपूर… इस किताब का प्रत्येक अध्याय नए उद्घाटनों से समृद्ध है… इस महान बौद्धिक योगदान को पढ़ने का मेरा अनुभव शायद इससे अधिक समृद्ध नहीं हो सकता था।” — Mondoweiss

“ज़ायोनवाद जैसे एक काल-बाह्य औपनिवेशिक उपक्रम की सफलता के कारणों का गंभीर और संयत विश्लेषण करते हुए राशिद ख़ालिदी यह भी दिखाते हैं कि फ़िलिस्तीनी लोग नियतिवाद को अस्वीकार करते हैं और मिटने से इंकार करते हैं। यह पुस्तक उनके लोगों के धैर्य और दृढ़ता को श्रद्धांजलि भी है और उसका विस्तार भी।” — अमीरा हास, लेखिका, Drinking the Sea at Gaza

“यह तीक्ष्ण वृत्तांत फ़िलिस्तीनी अनुभव की उस औपनिवेशिक प्रकृति को पहले से अधिक स्पष्ट करता है, जिसे अक्सर जानबूझकर कम करके आंका गया है— और हमें याद दिलाता है कि स्थानीय और वैश्विक शक्तियों के विरुद्ध भी फ़िलिस्तीनी असाधारण स्थिरता से डटे रहे हैं।” — सरी माकदिसी, लेखक, Palestine Inside Out: An Everyday Occupation of Culture

“ख़ालिदी अपने तर्कों को प्रस्तुत करने में कठोर और स्पष्ट हैं; वे प्रमाणों को सुव्यवस्थित ढंग से सामने रखते हैं, विरोधियों के प्रति संतुलित रहते हैं और अपने पक्ष की कमियों पर भी कठोर टिप्पणी करते हैं।” — डेविड गार्डनर, Financial Times

“एक रोमांचक और मौलिक कृति। फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध एक सदी लंबे युद्ध का पहला ऐसा अध्ययन, जो उनके संघर्ष में गहरी भागीदारी के आधार पर लिखा गया है . . . दृढ़ विद्वत्ता, जीवंत निजी अनुभव और इस गहरे असमान संघर्ष के दोनों पक्षों की चिंताओं व आकांक्षाओं की पैनी समझ से समृद्ध।” — नोम चॉम्स्की

“साहसी, विलक्षण और आधिकारिक— यह उत्कृष्ट ऐतिहासिक शोध-कार्य उच्च नाटकीयता और आकर्षक कथन-शैली से भी भरपूर है। ख़ालिदी इस विषय पर प्रचलित पश्चिमी दृष्टिकोण के पुनर्मूल्यांकन के लिए ठोस प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। यह पुस्तक अरब-इज़रायली संघर्ष के अध्ययन में बड़ी उपलब्धि है।” — एवी श्लाइम, लेखक, The Iron Wall: Israel and the Arab World

“विद्वान फ़िलिस्तीनी दृष्टिकोण द्वारा प्रस्तुत एक जटिल और प्रतीततः असाध्य संघर्ष का समयोचित, स्पष्ट और धैर्यपूर्ण इतिहास लेखन।” — Kirkus

“यह पुस्तक शोध और निजी इतिहास का अद्वितीय समन्वय है, जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा; आने वाले वर्षों में यह फ़िलिस्तीनी ऐतिहासिक परंपरा में एक प्रमुख स्थान ग्रहण करेगी।” — Literary Hub

“फ़िलिस्तीनियों के एक सदी लंबे युद्ध के जीवित अनुभव पर केंद्रित, और उसे जन्म देने वाली भू-राजनीतिक शक्तियों को मद्देनज़र रखते हुए, राशिद ख़ालिदी ने व्यापक विद्वत्ता से सम्पन्न ऐसी पुस्तक लिखी है, जिसमें एक उपन्यास जैसी कोमलता और तीव्रता है।” — अहदाफ़ सुवैफ़, लेखिका, The Map of Love

“बुद्धिमत्ता और दूरदृष्टि के साथ, राशिद ख़ालिदी इज़रायलियों और फ़िलिस्तीनियों दोनों की भ्रांतियों को विराम देते हैं। वह उत्कृष्ट शोध को युद्ध और कूटनीति के अपने विस्तृत प्रत्यक्ष अनुभव के साथ जोड़ते हुए परस्पर स्वीकृति और समान अधिकारों को ही एक सदी पुराने संघर्ष के अंत का एकमात्र मार्ग बताते हैं। एक असाधारण पुस्तक।” — यूजीन रोगन, लेखक, The Arabs: A History

“यह पुस्तक वैश्विक स्तर पर सैटलर उपनिवेशवाद के अध्ययन के लिए एक उत्कृष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करती है। आप ख़ालिदी से असहमत हो सकते हैं, पर उनसे संवाद करने का अवसर खो नहीं सकते।” — होमी के. भाभा, लेखक, The Location of Culture

“सुंदर शैली में लिखी गई और सहज पठनीय, यह पुस्तक फ़िलिस्तीनी-ज़ायोनवादी मुठभेड़ का अमूल्य विश्लेषण प्रस्तुत करती है। इसे ‘संघर्ष समाधान’ के प्रश्न के रूप में नहीं, बल्कि सैटलर औपनिवेशिक प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष के रूप में समझने की ज़रूरत है। युद्ध को गहराई से समझने और उसके सार्थक समाधान के लिए यह दृष्टि अनिवार्य है।” — सारा रॉय, लेखिका, Hamas and Civil Society in Gaza

“राशिद ख़ालिदी स्पष्ट करते हैं कि ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रचुर सहायता के बिना ज़ायोनवादी आधुनिक इज़रायल की स्थापना नहीं कर सकते थे। इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष की वास्तविक जड़ों को समझने में रुचि रखने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक अनिवार्य पाठ है।” — जॉन जे. मीयर्सहाइमर, सह-लेखक, The Israel Lobby

“फ़िलिस्तीनी मुक्ति-संघर्ष का एक उत्कृष्ट और बेबाक इतिहास… ख़ालिदी उन वैश्विक और घरेलू राजनेताओं की घोर विफलताओं की आलोचना करने में कोई संकोच नहीं करते, जिन्होंने फ़िलिस्तीन की निरंतर पीड़ा को बनाए रखने में भूमिका निभाई है।” — Morning Star

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फ़िलिस्तीन : युद्ध के सौ वर्ष (UPCOMING)

Rashid Khalidi (राशिद ख़ालिदी)

चार साल पहले जब मैंने इस किताब को पूरा किया था, उसके कुछ ही समय बाद अक्टूबर 2023 में इस लंबे युद्ध का शायद सबसे वहशी और हिंसक चरण भड़क उठा। मैं जब यह लिख रहा हूं तो युद्ध अपने 19वें महीने में प्रवेश कर चुका है। तब से अब तक हमने जिन भयावह घटनाओं को देखा है, उन्होंने इस किताब के केंद्रीय तर्क को पूरी तरह सही साबित कर दिया है : 1917 के बाद से फ़िलिस्तीन में जो कुछ हुआ, वह मुख्यतः एक बहु-स्तरीय युद्ध का नतीजा था। एक ऐसा युद्ध, जो सैटलर ज़ायोनवादी आंदोलन के साथ गठबंधन करने वाली कई बड़ी ताक़तों ने स्थानीय फ़िलिस्तीनी आबादी पर थोपा। यह आंदोलन एक साथ सैटलर उपनिवेशवादी भी था और राष्ट्रवादी भी। इसका उद्देश्य फ़िलिस्तीनी लोगों को उनके पैतृक वतन से विस्थापित कर देना था, जिससे एक अरब मुल्क को एक यहूदी राज्य में बदला जा सके। बाद में इनमें से कई बड़ी ताक़तें उभरते हुए इज़रायली राष्ट्र-राज्य की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं। एक सदी से ज़्यादा समय से चल रहे इस युद्ध के दौरान फ़िलिस्तीनियों ने अपने मुल्क पर विभिन्न तरीक़ों से लगातार हो रहे क़ब्ज़े और हड़प की मुख़ालिफ़त की है।

मैं इस ढांचे को न केवल 1917 के बाद के इतिहास को समझने के लिए ज़रूरी मानता हूं, बल्कि 7 अक्टूबर 2023 के बाद से जिस चौंकाने वाली बर्बरता को हमने देखा है, उसे समझने के लिए भी। यह वह ‘सदियों पुराना’ अरब-यहूदी या मुसलमान-यहूदी संघर्ष नहीं है, जैसा कि अक्सर यह झूठ प्रस्तुत किया जाता है। न ही यह केवल दो क़ौमों या दो समुदायों के बीच का कोई साधारण राष्ट्रीय संघर्ष है। हालांकि यह वह है भी। असल में यह कुछ विशिष्ट ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का बहुत हालिया उत्पाद है। इनमें शामिल हैं मध्य पूर्व में साम्राज्यवाद का हस्तक्षेप, अरब और यहूदी दोनों तरह के राष्ट्र-राज्य राष्ट्रवाद का उभार, फ़िलिस्तीन को ‘इज़रायल की ज़मीन’ में बदलने के लिए ज़ायोनवादी आंदोलन द्वारा अपनाए गए सैटलर उपनिवेशवादी तौर-तरीक़े, जैसा कि ज़ायोनवादी नेता ज़ेएव जाबोटिन्स्की ने कहा था, और इन हिंसक सेटलर उपनिवेशवादी लक्ष्यों और तरीक़ों के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनियों की जिद्दी, अहिंसक और हिंसक दोनों तरह की मुक़ाबले की परंपरा।

इसके अलावा, यह युद्ध कभी भी केवल ज़ायोनवादी आंदोलन और इज़रायल एक तरफ़ और कुछ अरब या अन्य ताक़तों की मदद के साथ फ़िलिस्तीनी दूसरी तरफ़ के बीच का युद्ध नहीं रहा। हमेशा से ही इस युद्ध में हर दौर की सबसे बड़ी वैश्विक ताक़तों का विशाल हस्तक्षेप शामिल रहा है। वह भी स्पष्ट तौर पर ज़ायोनवादी आंदोलन और इज़रायल के पक्ष में: द्वितीय विश्व युद्ध तक ब्रिटेन और उसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य शक्तियां। ये महाशक्तियां कभी भी तटस्थ या ‘ईमानदार मध्यस्थ’ नहीं थीं। वे हमेशा से, और आज भी, इस युद्ध में इज़रायल के साथ और उसके समर्थन में सक्रिय साझेदार हैं। उपनिवेशक और उपनिवेशित, दमनकर्ता और दमित के बीच चल रहे इस युद्ध में शुरू से ही दोनों पक्षों में कोई बराबरी नहीं रही है। सैनिक, आर्थिक और हर अन्य मायने में भारी असमानता हमेशा ज़ायोनवाद और इज़रायल के पक्ष में रही है।

7 अक्टूबर के बाद जो घटनाएं सामने आईं, उन्होंने इस पूरी थीसिस को बेधड़क पुष्टि दी। ताक़त के चरम असंतुलन को हम मौत, तबाही और विस्थापन के बेहिसाब स्तर में साफ़ देखते हैं: मारे गए फ़िलिस्तीनियों और इज़रायलियों का अनुपात 30:1 से भी अधिक है। इस असंतुलन को संयुक्त राज्य अमेरिका का इज़रायल को दिया जाने वाला अपार और अडिग राजनीतिक, राजनयिक, ख़ुफ़िया और सैन्य समर्थन, और मज़बूत करता है। साथ ही ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस और अन्य पश्चिमी देशों का समर्थन। इसके मुकाबले ईरान, कुछ अरब देशों और कुछ गैर-राज्यीय समूहों द्वारा फ़िलिस्तीनियों को मिलने वाला समर्थन बेहद सीमित और अधिकतर अप्रभावी रहा है।