चार साल पहले जब मैंने इस किताब को पूरा किया था, उसके कुछ ही समय बाद अक्टूबर 2023 में इस लंबे युद्ध का शायद सबसे वहशी और हिंसक चरण भड़क उठा। मैं जब यह लिख रहा हूं तो युद्ध अपने 19वें महीने में प्रवेश कर चुका है। तब से अब तक हमने जिन भयावह घटनाओं को देखा है, उन्होंने इस किताब के केंद्रीय तर्क को पूरी तरह सही साबित कर दिया है : 1917 के बाद से फ़िलिस्तीन में जो कुछ हुआ, वह मुख्यतः एक बहु-स्तरीय युद्ध का नतीजा था। एक ऐसा युद्ध, जो सैटलर ज़ायोनवादी आंदोलन के साथ गठबंधन करने वाली कई बड़ी ताक़तों ने स्थानीय फ़िलिस्तीनी आबादी पर थोपा। यह आंदोलन एक साथ सैटलर उपनिवेशवादी भी था और राष्ट्रवादी भी। इसका उद्देश्य फ़िलिस्तीनी लोगों को उनके पैतृक वतन से विस्थापित कर देना था, जिससे एक अरब मुल्क को एक यहूदी राज्य में बदला जा सके। बाद में इनमें से कई बड़ी ताक़तें उभरते हुए इज़रायली राष्ट्र-राज्य की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं। एक सदी से ज़्यादा समय से चल रहे इस युद्ध के दौरान फ़िलिस्तीनियों ने अपने मुल्क पर विभिन्न तरीक़ों से लगातार हो रहे क़ब्ज़े और हड़प की मुख़ालिफ़त की है।
मैं इस ढांचे को न केवल 1917 के बाद के इतिहास को समझने के लिए ज़रूरी मानता हूं, बल्कि 7 अक्टूबर 2023 के बाद से जिस चौंकाने वाली बर्बरता को हमने देखा है, उसे समझने के लिए भी। यह वह ‘सदियों पुराना’ अरब-यहूदी या मुसलमान-यहूदी संघर्ष नहीं है, जैसा कि अक्सर यह झूठ प्रस्तुत किया जाता है। न ही यह केवल दो क़ौमों या दो समुदायों के बीच का कोई साधारण राष्ट्रीय संघर्ष है। हालांकि यह वह है भी। असल में यह कुछ विशिष्ट ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का बहुत हालिया उत्पाद है। इनमें शामिल हैं मध्य पूर्व में साम्राज्यवाद का हस्तक्षेप, अरब और यहूदी दोनों तरह के राष्ट्र-राज्य राष्ट्रवाद का उभार, फ़िलिस्तीन को ‘इज़रायल की ज़मीन’ में बदलने के लिए ज़ायोनवादी आंदोलन द्वारा अपनाए गए सैटलर उपनिवेशवादी तौर-तरीक़े, जैसा कि ज़ायोनवादी नेता ज़ेएव जाबोटिन्स्की ने कहा था, और इन हिंसक सेटलर उपनिवेशवादी लक्ष्यों और तरीक़ों के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनियों की जिद्दी, अहिंसक और हिंसक दोनों तरह की मुक़ाबले की परंपरा।
इसके अलावा, यह युद्ध कभी भी केवल ज़ायोनवादी आंदोलन और इज़रायल एक तरफ़ और कुछ अरब या अन्य ताक़तों की मदद के साथ फ़िलिस्तीनी दूसरी तरफ़ के बीच का युद्ध नहीं रहा। हमेशा से ही इस युद्ध में हर दौर की सबसे बड़ी वैश्विक ताक़तों का विशाल हस्तक्षेप शामिल रहा है। वह भी स्पष्ट तौर पर ज़ायोनवादी आंदोलन और इज़रायल के पक्ष में: द्वितीय विश्व युद्ध तक ब्रिटेन और उसके बाद संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य शक्तियां। ये महाशक्तियां कभी भी तटस्थ या ‘ईमानदार मध्यस्थ’ नहीं थीं। वे हमेशा से, और आज भी, इस युद्ध में इज़रायल के साथ और उसके समर्थन में सक्रिय साझेदार हैं। उपनिवेशक और उपनिवेशित, दमनकर्ता और दमित के बीच चल रहे इस युद्ध में शुरू से ही दोनों पक्षों में कोई बराबरी नहीं रही है। सैनिक, आर्थिक और हर अन्य मायने में भारी असमानता हमेशा ज़ायोनवाद और इज़रायल के पक्ष में रही है।
7 अक्टूबर के बाद जो घटनाएं सामने आईं, उन्होंने इस पूरी थीसिस को बेधड़क पुष्टि दी। ताक़त के चरम असंतुलन को हम मौत, तबाही और विस्थापन के बेहिसाब स्तर में साफ़ देखते हैं: मारे गए फ़िलिस्तीनियों और इज़रायलियों का अनुपात 30:1 से भी अधिक है। इस असंतुलन को संयुक्त राज्य अमेरिका का इज़रायल को दिया जाने वाला अपार और अडिग राजनीतिक, राजनयिक, ख़ुफ़िया और सैन्य समर्थन, और मज़बूत करता है। साथ ही ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस और अन्य पश्चिमी देशों का समर्थन। इसके मुकाबले ईरान, कुछ अरब देशों और कुछ गैर-राज्यीय समूहों द्वारा फ़िलिस्तीनियों को मिलने वाला समर्थन बेहद सीमित और अधिकतर अप्रभावी रहा है।
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