तर्क करना देशद्रोह नहीं है – मीरा नंदा क्यों ऐसा मानती हैं?

तर्क करना देशद्रोह नहीं है - मीरा नंदा क्यों ऐसा मानती हैं

एक सवाल से शुरू करते हैं।

अगर कोई कहे कि हवाई जहाज़ का आविष्कार राइट बंधुओं ने नहीं, बल्कि प्राचीन भारत में हुआ था और आप उससे सवाल करें – तो क्या आप देशद्रोही हैं?

अगर कोई कहे कि कोविड की दवा किसी आयुर्वेदिक काढ़े में है और आप उसका प्रमाण माँगें तो क्या आप अपनी संस्कृति के दुश्मन हैं?

मीरा नंदा पिछले तीस साल से यही सवाल पूछ रही हैं।

और इसीलिए उन्हें देशद्रोही, हिंदू-विरोधी, और न जाने क्या-क्या कहा गया है।

एक वैज्ञानिक जिन्होंने सवाल पूछना कभी नहीं छोड़ा

मीरा नंदा का जन्म 1954 में हुआ। उनकी पढ़ाई विज्ञान से शुरू हुई – IIT दिल्ली से जैव-प्रौद्योगिकी में पहली PhD। फिर अमेरिका के Rensselaer Polytechnic Institute से विज्ञान के इतिहास और दर्शन में दूसरी PhD।

लेकिन उनकी असली पहचान किसी प्रयोगशाला में नहीं बनी।

वे Indian Express में विज्ञान संवाददाता रहीं। फिर लिखने लगीं – किताबें, लेख, शोध। IISER मोहाली में वर्षों तक विज्ञान का इतिहास पढ़ाया और धीरे-धीरे एक ऐसी आवाज़ बन गईं जो भारत में विज्ञान, तर्क और सच्चाई के लिए अकेले खड़ी रहती है।

उन्होंने खुद कहा है कि विज्ञान की पद्धति ने उन्हें एक भारतीय स्त्री के रूप में उन तमाम दमनकारी सामाजिक सच्चाइयों से मुक्त किया जो उन्हें घेरे हुए थीं।

वह पल जब सब बदल गया

1990 के दशक में भारत में एक नई बात हो रही थी।

धर्म और राष्ट्रवाद एक-दूसरे में घुलने लगे थे। “वैदिक विज्ञान” की बातें होने लगी थीं। पाठ्यक्रमों में ज्योतिष को विषय बनाने की माँग उठने लगी थी। यह सब “भारतीय ज्ञान” के नाम पर हो रहा था।

मीरा नंदा ने इसे ध्यान से देखा।

और उन्होंने एक किताब लिखी — Prophets Facing Backward (2004)। इसमें उन्होंने तर्क दिया कि जो लोग पश्चिमी विज्ञान को नकारकर “भारतीय ज्ञान प्रणाली” की बात करते हैं, वे दरअसल राष्ट्रवादी राजनीति को वैचारिक आधार दे रहे हैं।

इस किताब में उन्होंने नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से दस साल पहले ही उस राजनीतिक उभार और उसके साथ आधुनिक विज्ञान के कमज़ोर पड़ने की भविष्यवाणी कर दी थी।

जब वह हुआ जो उन्होंने कहा था – तो लोगों ने उनकी किताब फिर से पढ़ी।

उनकी सोचसरल शब्दों में

मीरा नंदा का मुख्य सवाल यह है –

क्या कोई भी विचार, कोई भी दावा, सिर्फ़ इसलिए सच हो जाता है क्योंकि वहहमारी परंपराका हिस्सा है?

उनका जवाब है – नहीं।

सच वही है जो प्रमाण से साबित हो, जो जाँचा जा सके, जो सवाल सहे।

जब कोई कहता है कि “वेदों में सब कुछ पहले से लिखा है” , तो मीरा नंदा पूछती हैं – प्रमाण कहाँ है?

जब कोई कहता है कि “हमारे पूर्वजों ने हवाई जहाज़ बनाए थे” , तो वे पूछती हैं – किस आधार पर?

और जब यह सवाल पूछने पर उन्हें देशद्रोही कहा जाता है , तो वे कहती हैं – सवाल पूछना देशभक्ति है, देशद्रोह नहीं।


उन्होंने क्याक्या देखा जिसने उन्हें चिंतित किया

मीरा नंदा सिर्फ़ किताबों में नहीं जीतीं। उन्होंने असल ज़िंदगी में बहुत कुछ देखा जो उन्हें परेशान करता रहा।

उन्होंने देखा कि पाठ्यक्रम बदले जा रहे हैं – NCERT की किताबों से डार्विन का विकासवाद हटाया जा रहा है। वे जो पीढ़ी बन रही है उसे यह नहीं बताया जा रहा कि जीवन कैसे विकसित हुआ।

उन्होंने देखा कि कोविड के दौरान आयुर्वेदिक काढ़ों और गोबर-गोमूत्र को दवा की तरह प्रचारित किया गया — बिना किसी वैज्ञानिक परीक्षण के। सरकारी समर्थन से।

उन्होंने देखा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली के नाम पर ज्योतिष, वास्तुशास्त्र और दूसरी बातों को विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाने लगा — विज्ञान के बराबर।

और उन्होंने देखा कि इन सब बातों पर सवाल उठाने वालों को हिंदूविरोधी या पश्चिमी एजेंट कहा जाने लगा।

यह सब देखकर वे चुप नहीं रहीं।


आलोचना

मीरा नंदा को जब से लिखना शुरू किया, तब से विरोध का सामना करना पड़ा।

उनके विचारों की आलोचना करते हुए कुछ लोगों ने कहा कि वे “हिंदू धर्म से नफ़रत करती हैं” और उनका पूरा काम उसी नफ़रत की सेवा में है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने उन पर “हिंदूफोबिया” का आरोप लगाया।

कुछ लोगों ने उन्हें “मार्क्सवादी एजेंट” कहा। कुछ ने “ईसाई लॉबी का हथियार।”

लेकिन मीरा नंदा ने हर बार यह स्पष्ट किया – उनकी आलोचना सिर्फ़ हिंदुत्व तक सीमित नहीं। जब अमेरिका में ईसाई धार्मिक समूह विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव करवाते हैं – वे उसकी भी आलोचना करती हैं। जब इस्लामी देशों में विज्ञान को धर्म के अनुसार ढाला जाता है – वे वहाँ भी सवाल उठाती हैं।

उनका सवाल धर्म से नहीं है। उनका सवाल उस राजनीति से है जो धर्म का इस्तेमाल सच को दबाने के लिए करती है।


सम्मान

इतने विरोध के बावजूद  या शायद इसीलिए – उनके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

2005 से 2007 तक वे John Templeton Foundation की Fellow रहीं – धर्म और विज्ञान के अध्ययन के लिए।

2009 में वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के उन्नत अध्ययन संस्थान में Fellow रहीं।

2023 में उन्हें Committee for Skeptical Inquiry का Fellow चुना गया – यह संस्था विज्ञान और तर्कसंगत सोच के लिए विश्व की सबसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में से एक है। उनके साथ चुने गए लोगों में दुनिया के जाने-माने वैज्ञानिक और विचारक थे।

American Council of Learned Societies ने भी उन्हें शोध-अनुदान दिया।

उनकी किताबेंएक नज़र में

मीरा नंदा ने कई किताबें लिखी हैं — हर एक एक ज़रूरी सवाल पर।

Prophets Facing Backward (2004) – उनकी पहली बड़ी किताब। इसमें उन्होंने दिखाया कि कैसे उत्तर-आधुनिक विचारधारा और हिंदुत्व एक-दूसरे को ताक़त दे रहे हैं।

The God Market (2009) – भारत में धर्म के बढ़ते बाज़ार पर। कैसे वैश्वीकरण के साथ-साथ धार्मिक व्यापार भी बढ़ा।

Science in Saffron (2016) – प्राचीन भारतीय विज्ञान के दावों की जाँच। क्या सच में सब कुछ वेदों में था?

और अब – A Field Guide to Post-Truth India (2024) – उनकी सबसे नई और सबसे ज़रूरी किताब। जिसका हिंदी अनुवाद AAS Publishers लेकर आ रहा है।


तर्क करनादेशद्रोह क्यों नहीं?

मीरा नंदा की पूरी ज़िंदगी इस एक सवाल का जवाब है।

एक देश तब मज़बूत होता है जब उसके नागरिक सोच सकें। जब वे सवाल पूछ सकें। जब कोई भी विचार – चाहे वह धर्म से आए, राजनीति से आए, या परंपरा से – उसे जाँचा जा सके।

जब सवाल पूछना बंद होता है – तो झूठ फलने-फूलने लगता है। मिथक इतिहास बन जाते हैं। छद्म विज्ञान असली विज्ञान की जगह ले लेता है।

और यह सिर्फ़ किताबों की बात नहीं है। यह उस बच्चे की बात है जो स्कूल में ग़लत पढ़ रहा है। उस मरीज़ की बात है जिसे ग़लत इलाज मिल रहा है। उस नागरिक की बात है जिसे ग़लत इतिहास बताया जा रहा है।

मीरा नंदा इसीलिए लिखती हैं।

इसीलिए उन्हें देशद्रोही कहा जाता है।

और इसीलिए उन्हें पढ़ा जाना चाहिए।

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