हिंदी के पाठकों को विश्व साहित्य तक पहुंच का हक क्यों है?

हिंदी में पढ़ने वाले करोड़ों पाठक हैं। वे कहानियाँ, उपन्यास, विचार और सपने खोजते हैं। लेकिन उनकी किताबों की अलमारी अक्सर अधूरी रह जाती है। दुनिया भर के उन महान साहित्यिक कार्यों तक उनकी पहुंच सीमित हो जाती है जो अन्य भाषाओं में दशकों से उपलब्ध हैं।

यह सिर्फ़ किताबों की कमी नहीं है – यह अवसरों की कमी है।

एक भाषा, एक दुनिया

जब हम केवल अपनी भाषा और अपनी संस्कृति तक सीमित रहते हैं, तो हमारी समझ भी सीमित हो जाती है। विश्व साहित्य हमें उन अनुभवों से जोड़ता है जो हम कभी व्यक्तिगत रूप से नहीं जी सकते।

ये आवाज़ें हमें बताती हैं कि दुख, आशा, प्रेम और संघर्ष सार्वभौमिक हैं। हिंदी का पाठक इनसे वंचित रहे, तो उसकी संवेदना और उसकी सोच का विकास रुक जाएगा।

भाषा का विकास अनुवाद से होता है

इतिहास गवाह है – कोई भी भाषा अनुवाद के बिना समृद्ध नहीं हुई।

संस्कृत ने यूनानी और प्राकृत विचारों को अपनाया। उर्दू ने फ़ारसी, अरबी और हिंदवी का सुंदर मेल किया। हिंदी ने भी कबीर, ग़ालिब, प्रेमचंद और महादेवी वर्मा के ज़रिए विविधता को आत्मसात किया।

आज अगर हिंदी को विश्व स्तर की भाषा बनना है, तो उसे काफ्का, बोर्गेस, महफ़ूज़, मुराकामी, चिमामांडा अदिची और सलमान रुश्दी जैसी आवाज़ों की ज़रूरत है। अनुवाद हिंदी को कमज़ोर नहीं करता – उसे और ज़्यादा लचीला, समृद्ध और जीवंत बनाता है।

हर अच्छा अनुवाद हिंदी शब्दावली को नई अभिव्यक्तियाँ देता है, नई लय देता है और नई सोच देता है।

पाठक हकदार है

हिंदी का पाठक:

वह जानने का हकदार है कि दुनिया भर में लोग कैसे जी रहे हैं, सोच रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। वह उन विचारों तक पहुँचने का हकदार है जिन्होंने पूरी सभ्यताओं की दिशा बदली है।

जब हिंदी में अच्छे अनुवाद उपलब्ध नहीं होते, तो हम पाठक को दो विकल्प देते हैं – या तो अंग्रेज़ी सीख लो, या अधूरी दुनिया के साथ समझौता कर लो। दोनों ही विकल्प अन्यायपूर्ण हैं।

अनुवाद= सांस्कृतिक न्याय

विश्व साहित्य तक पहुंच देना सिर्फ़ प्रकाशन का काम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक न्याय है।

AAS Publishers में हम मानते हैं कि हिंदी का पाठक दुनिया की बेहतरीन किताबों का हकदार है। हम सिर्फ़ वे किताबें नहीं लाना चाहते जो बाज़ार में चल रही हैं, बल्कि वे भी जो ज़रूरी हैं – जो सोच को चुनौती देती हैं, जो दिल को छूती हैं और जो हमें बेहतर इंसान बनाती हैं।

आगे का रास्ता

हिंदी प्रकाशन जगत को अब इस मानसिकता से ऊपर उठना होगा कि अनुवाद “दूसरी पसंद” है। अनुवादक को सम्मान और उचित मेहनताना मिलना चाहिए। युवा अनुवादकों को प्रोत्साहन चाहिए। और पाठकों को लगातार बेहतरीन विश्व साहित्य उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

हिंदी के पाठक कम नहीं हैं।उनकी भूख भी कम नहीं है।

बस उन्हें सही किताबें सही भाषा में चाहिए।

जब हिंदी का पाठक विश्व साहित्य पढ़ेगा, तो न सिर्फ़ उसकी दुनिया बड़ी होगी – पूरी हिंदी भाषा की दुनिया बड़ी होगी।

AAS Publishers – संस्कृतियाँअनुवादसेबढ़तीहैं।

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