ग़ज़ा से ख़त और अन्य कहानियां

Ghassan Kanafani (ग़स्सान कनफ़ानी)

Translated by इनाम नदीम

Language: अरबी से अनुवाद

Paperback 176 pages

Published 25th April 2026

250

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ग़ज़ा के आसमान पर बमबारी की गूंज और बच्चों के ख़ौफ़-ज़दा चेहरों पर आँसूओं की नमी अभी सूखी नहीं कि हम एक बार फिर ग़स्सान कनफ़ानी की रचनाओं की ओर लौटने पर मजबूर हो गए हैं। ऐसा लगता है कि कनफ़ानी की कहानियां वक़्त के किसी लम्हे में क़ैद नहीं हैं, वे ज़िंदा हैं, सांस लेती हैं और हर धमाके, हर तबाह स्कूल, हर असहाय और बेसहारा शरणार्थी की चीख़ के साथ नया जन्म लेती हैं।

ग़स्सान कनफ़ानी न सिर्फ फ़िलिस्तीनी प्रतिरोध का एक चमकदार साहित्यिक मानक हैं बल्कि वह अरबी कहानियों की ऐतिहासिक मशाल को अंदरुनी पीड़ा के जिस धारे पर लेकर चले, वह आज भी बेमिसाल है। उनकी कहानियां कोई वैचारिक विरोध नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के उन किरदारों की दर्द-भरी दास्तान नोहा हैं, जो अपनी सरज़मीं से बेदख़ल होने के बाद ख़्वाब और भूख के बीच झुलते रहते हैं। कनफ़ानी ने फ़िलिस्तीनी अस्तित्व के बिखरे लम्हों को जिस सादा मगर प्रभावशाली शैली में बयान किया, वह उर्दू ज़बान के पाठकों के लिए भी किसी अनजाने अनुभव से कम नहीं।

इस किताब में शामिल अनुवाद वास्तव में मौजूद लम्हों का जवाब हैं। इस वक़्त जब ग़ज़ा की गलियां ख़ाकसतर हो रही हैं, जब बच्चों के बस्ते मलबे तले दबे मिल रहे हैं और जब अंतरराष्ट्रीय विरोध रिवायत के मुताबिक ख़ामोशी की चादर ओढ़े सोया हुआ है। ऐसे में कनफ़ानी की कहानियां महज़ साहित्यिक मोंताज नहीं, बल्कि सच्चाई की वह गवाही बन जाती हैं, जो न दबाई जा सकती है न झुठलाई।

इन कहानियों का उर्दू अनुवाद एक तरफ़ तो ज़बान की हदों को पार करके फ़िलिस्तीनी अनुभव को उर्दू के पाठकों के क़रीब लाता है, और दूसरी तरफ़ उर्दू अदब में ज़ुल्म, निर्वासन और पहचान के विषयों पर जारी बहस को एक नई राह दिखाता है। ये अनुवाद न सिर्फ कनफ़ानी की शैली की सादगी, रुहानी ताक़त और जज़्बाती गहराई को पाठक के अंदर पैदा करने की एक कोशिश हैं बल्कि उर्दू ज़बान में प्रतिरोध और स्मृति के सिलसिले का एक हिस्सा भी है।

ग़स्सान कनफ़ानी ने एक बार कहा था, “तुम एक आदमी को मार सकते हो, लेकिन उस कहानी को नहीं, जो उसने सुनाई हो।” इस किताब में वही कहानियां सांस ले रही हैं। ज़ख़्म-ख़ुर्दा, लेकिन ज़िंदा…!

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ग़ज़ा से ख़त और अन्य कहानियां

Ghassan Kanafani (ग़स्सान कनफ़ानी)

3. ग़ज़ा से ख़त

प्रिय मुस्तफ़ा,

तुम्हारा ख़त मिला। उसमें लिखा था कि तुमने सैक्रामेंटो में मेरे ठहरने के सभी इंतज़ाम कर दिए हैं। साथ ही यह ख़बर भी मिली कि मुझे यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलीफ़ोर्निया में सिविल इंजीनियरिंग विभाग में दाख़िला दे दिया गया है। मेरे दोस्त, इन तमाम कोशिशों के लिए मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं। मगर शायद तुम्हें कुछ अजीब लगे, जब मैं तुम्हें यह सब बताते हुए एक बात और कहूं। और यक़ीन रखो, मैं ज़र्रा बराबर भी संदेह का शिकार नहीं हूं। बल्कि शायद ज़िंदगी में पहली बार मुझे सब कुछ इस क़दर साफ़ नज़र आ रहा है। नहीं, मेरे दोस्त, मैंने इरादा बदल लिया है। मैं तुम्हारे पीछे उस सरज़मीं पर नहीं जाऊंगा जहां, जैसा कि तुमने लिखा है, हरियाली है, पानी है और ख़ूबसूरत चेहरे हैं। नहीं, मैं यहीं रहूंगा। और अब यहां से कभी नहीं जाऊंगा।

मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है, मुस्तफ़ा, कि हमारी ज़िंदगियां अब एक ही रास्ते पर साथ-साथ नहीं चल सकेंगी। यूं लगता है जैसे साथ में लिया गया वह वादा याद दिलाती हुई अब भी तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों में गूंज रही है, वह नारा, जो हम दोनों अक्सर लगाया करते थे : “हम अमीर होंगे।” लेकिन मेरे दोस्त, अब मेरे क़ाबू में कुछ भी नहीं। हां, मुझे अब भी वह दिन याद है, जब मैं क़ाहिरा एयरपोर्ट के हॉल में तुम्हारा हाथ थामे खड़ा था और इंजनों की दीवानों की तरह गरजती आवाज़ सुन रहा था। उस लम्हे यूं लग रहा था, जैसे सब कुछ इस शोर में शामिल होकर घूम रहा हो, और तुम मेरे सामने ख़ामोश खड़े थे, वही गोल-मटोल-सा चेहरा लिए।

तुम्हारा चेहरा बिल्कुल वैसा ही था, जैसा शुजाइया के मुहल्ले में गुज़रे हमारे बचपन में हुआ करता था। अब बस उस पर कुछ हल्की झुर्रियों का इज़ाफ़ा हो गया था। हम साथ-साथ पले-बढ़े थे, एक-दूसरे को पूरी तरह समझने वाले, और हमने वादा किया था कि आख़िर तक साथ रहेंगे। लेकिन…

मैं आसमान की ओर देख रहा था और तुम मुझसे कह रहे थे,

“अभी जहाज़ उड़ने में पंद्रह मिनट बाक़ी हैं। यूं आसमान में मत देखो। सुनो, तुम अगले साल कुवैत जाओगे। वहां की तनख़्वाह से इतना बचा लोगे कि ख़ुद को ग़ज़ा से उखाड़कर कैलीफ़ोर्निया में बसा सको। हमने एक साथ आग़ाज़ किया था, और हमें यह सफ़र पूरा करना है।”

उस लम्हे मैं तुम्हारे होंठों को तेज़ी से हरकत करते देख रहा था। तुम हमेशा ऐसे ही बात करते थे, न ठहराव, न संकोच। मगर किसी अनजाने एहसास ने मुझे बताया कि तुम उस सफ़र से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। तुम अपने उस फ़ैसले के पक्ष में तीन स्पष्ट कारण भी न दे सके। मैं भी उस जुदाई से तकलीफ़ में था, मगर मेरे दिल में सबसे साफ़ ख़्याल यही उभरा था : “हम इस ग़ज़ा को क्यों छोड़ें, और यहां से भाग निकलें? हम क्यों नहीं यहीं रह जाते?”

मगर तुम्हारी हालत बेहतर होने लगी थी। कुवैत के शिक्षा मंत्रालय ने तुम्हें स्कॉलरशिप दे दी थी। हालांकि, मुझे नहीं मिली थी। मैं जिस बदहाली की दलदल में जीता था, उसमें तुम मुझे समय-समय पर कुछ रक़म भेजते रहते थे। इस डर से कि कहीं मेरी ख़ुद्दारी को ठेस न लगे, तुम चाहते थे कि मैं उसे क़र्ज़ समझूं। तुम मेरे घर की हालत को अंदर-बाहर से अच्छी तरह जानते थे। यह भी जानते थे कि संयुक्त राष्ट्र के रिलीफ़ स्कूल में मेरी मामूली तनख़्वाह मेरी मां, मेरे भाई की बेवा और उसके चार बच्चों के लिए नाकाफ़ी है।

उड़ान से पहले मेरे गले लगते हुए तुमने कहा था,

“ग़ौर से सुनो। मुझे हर दिन ख़त लिखना। हर घंटे, हर लम्हे। जहाज़ बस रवाना होने ही वाला है। ख़ुदा-हाफ़िज़ नहीं, बल्कि जल्द मुलाक़ात होगी।”

तुम्हारे ठंडे होंठ मेरे गाल को छू गए। तुमने अपना चेहरा जहाज़ की ओर कर लिया, और जब दोबारा मेरी तरफ़ देखा तो तुम्हारी आंखों में आंसू थे।

बाद में कुवैत के शिक्षा मंत्रालय ने मुझे भी एक स्कॉलरशिप दे दी। अब तुम्हें यह तफ़सील बताने की ज़रूरत नहीं कि वहां मेरी ज़िंदगी कैसे गुज़री। मैं तुम्हें हर बात ख़त में लिखता रहा हूं। मेरी ज़िंदगी वहां एक चिपचिपी, बेमानी-सी कैफ़ियत लिए हुए थी, जैसे मैं कोई छोटा-सा घोंगा हूं, जो तन्हाई के गहरे अंधेरे में गुम है; भविष्य के उस अंधेरे से जंग में शामिल, जो रात के शुरुआती लम्हों जैसा है; एक सड़े हुए रूटीन की क़ैद में, वक़्त के साथ बेढंगी और थकी हुई कश्मकश में फंसा हुआ। हर चीज़ वहां गर्म और चिपचिपी थी। ज़िंदगी की पूरी कैफ़ियत में एक फिसलन-सी थी। हर लम्हा महीने के आख़िरी दिन का इंतज़ार करता रहता था।

उसी साल के मध्य में यहूदियों ने सुबह के वक़्त ग़ज़ा के मध्य क्षेत्र पर बमबारी की और ग़ज़ा, हमारा ग़ज़ा, शोला उगलते हथियारों और बमों से जला डाला। यह वाक़िया शायद मेरी यथास्थिति में कुछ तब्दीली ला सकता था, मगर मुझे तो अब इन सब पर ध्यान देने की भी फ़ुर्सत नहीं रही थी। मैं तो ग़ज़ा को हमेशा के लिए पीछे छोड़कर कैलीफ़ोर्निया जाने वाला था। वहीं जाकर मैं अपने लिए जिऊंगा, उस ‘मैं’ के लिए जो बरसों से दुख सहता आया था। मुझे ग़ज़ा से नफ़रत हो गई थी, उसके वासियों से भी। उस कटे-फटे शहर की हर चीज़ मुझे ऐसे धुंधले रेखाचित्र की याद दिलाती थी, जो किसी बीमार ज़हन ने सुरमई रंग से बनाए हों। हां, मैं अपनी मां, भाई की बेवा और उसके बच्चों को कुछ रक़म भिजवाता रहता था ताकि वे जी सकें, लेकिन उस आख़िरी रिश्ते से भी मुझे निजात हासिल करनी थी। वहां, हरे-भरे कैलीफ़ोर्निया में, जहां शिकस्त की वह बदबू न हो, जो पिछले सात बरस से मेरी सांसों में बसी हुई थी। मेरे भाई के बच्चों, उनकी मां और मेरी मां से जुड़ी हुई हमदर्दी कभी भी इतनी गहरी न थी कि मेरे साथ घटी उस प्रक्रिया को कोई वजह दे सके, जिसमें मैंने अपने व्यक्तित्व को अथाह गहराई में गिरा दिया था। अब इससे और नीचे गिरने की इजाज़त नहीं थी। मुझे भागना ही था।

तुम इन एहसासात को जानते हो मुस्तफ़ा, क्योंकि तुमने ख़ुद यह सब झेला है। आख़िर यह कैसा अस्पष्ट-सा बंधन था, जो हमें ग़ज़ा से जोड़े रखता था, और हमारी फ़रार की ख़्वाहिश को कमज़ोर करता रहता था? हमने कभी इस रिश्ते को पूरी तरह समझने की कोशिश क्यों नहीं की? हम इस शिकस्त को, उसके ज़ख़्मों के साथ, पीछे छोड़कर उस रोशन भविष्य की तरफ़ क्यों न बढ़ सके, जहां कोई गहरा सुकून हमारे इंतज़ार में हो सकता था? क्यों? हमें ख़ुद भी पूरी तरह इसका इल्म नहीं था।

जून में जब छुट्टियां आईं और मैंने अपना सारा सामान समेटकर उन छोटी-छोटी चीज़ों की आरज़ू में रुख़्सती की मीठी घड़ी का ख़्वाब बांधा, जो ज़िंदगी को रोशन और ख़ुशगवार मानी बख़्शती हैं, तो मुझे ग़ज़ा वैसा ही मिला जैसा मैं उसे जानता था : बंद, जैसे किसी ज़ंगआलूद घोंघे की अंदरूनी सतह, जिसे लहरों ने ज़िब्हख़ाने के पास चिपचिपे, रेतीले साहिल पर उछाल दिया हो। यह ग़ज़ा ख़्वाब में डूबे हुए किसी सहमे हुए इंसान के दिमाग़ से भी ज़्यादा तंग था, अपनी उन गलियों समेत, जिनसे शिकस्त और ग़ुर्बत की ख़ास बू आती थी, और वे मकान, जिनकी बालकनियां बाहर को उभरी हुई थीं। यही ग़ज़ा था।

लेकिन वह कौन-सी अदृश्य कशिश है, जो इंसान को उसके घर, उसके ख़ानदान, उसकी यादों की तरफ़ खींच लाती है, जैसे पहाड़ों में झरना बकरियों के रेवड़ को अपनी तरफ़ बुलाता हो? मैं नहीं जानता। मैं तो इतना जानता हूं कि उस सुबह मैं अपने घर गया, अपनी मां के पास। दरवाज़ा खोला तो मेरे मरहूम भाई की बेवा ने रोते हुए मुझे रोक लिया और पूछा कि क्या मैं उसकी ज़ख़्मी बेटी, नादिया, की ख़्वाहिश पर अमल करूंगा और उसे अस्पताल में जाकर शाम को मिलूंगा? क्या तुम नादिया को जानते हो, मेरे भाई की वह ख़ूबसूरत तेरह साल की बेटी?

उसी शाम मैंने पाव भर सेब ख़रीदे और अस्पताल की तरफ़ चल पड़ा ताकि नादिया को देख सकूं। मुझे पहले ही से अंदाज़ा हो चुका था कि उस मुलाक़ात में कुछ ऐसा है, जिसे मेरी मां और भाभी मुझसे छिपा रही हैं, कोई ऐसी बात, जिसे उनके होंठ कह नहीं सकते; कोई अनकही-सी चीज़, जो मेरी समझ की गिरफ़्त में नहीं आ रही थी। मैं नादिया से आदतन मुहब्बत करता था, उसी आदत से जो मुझे उस पूरी नस्ल से जोड़ती थी, जिसने शिकस्त और बेवतनी के साये में परवरिश पाई थी, और जिसके लिए ख़ुशहाल ज़िंदगी गोया कोई सामाजिक विरोध बन चुकी थी।

उस लम्हे क्या हुआ, मैं नहीं जानता। मैं बिल्कुल पुरसुकून अंदाज़ में उस सफ़ेद कमरे में दाख़िल हुआ। बीमार बच्चों में कुछ बेचैनी-सी होती है, विशेष रूप से उन बच्चों में, जो अपनी बीमारी की वजह ज़ुल्म और तकलीफ़ को ठहराते हों। नादिया बिस्तर पर अध-लेटी हुई थी। उसकी कमर एक बड़े तकिए से टिकी हुई थी, जिस पर उसके बालों का निचला सिरा किसी गहरे मख़मली फ़र्र की तरह बिखरा हुआ था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में एक गहरी ख़ामोशी थी, और उन काली पुतलियों की तह में हमेशा एक आंसू चमकता रहता था। उसका चेहरा सुकून की किसी तस्वीर जैसा था, मगर उसकी ख़ामोशी में एक ऐसी सदा थी, जैसी किसी सताए गए पैग़ंबर के चेहरे में होती है। नादिया अभी बच्ची थी, मगर वह किसी बच्चे से कहीं ज़्यादा लगती थी, कहीं ज़्यादा गहरी, कहीं ज़्यादा पुख़्ता।

“नादिया।”

मुझे मालूम नहीं कि यह आवाज़ मैंने दी या मेरे पीछे किसी और ने। मगर उसने आंखें उठाईं और मेरी तरफ़ देखा, और मुझे यूं महसूस हुआ जैसे मैं चीनी का कोई टुकड़ा हूं, जो गर्म चाय के प्याले में घुलने लगा हो। उसकी हल्की-सी मुस्कुराहट के साथ उसकी आवाज़ भी सुनाई दी,

“चचा, आप अभी कुवैत से आए हैं?”

उसकी आवाज़ उसके गले में टूटने लगी। उसने हाथों की मदद से ख़ुद को उठाया और गर्दन मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैंने उसकी पुश्त थपथपाई और उसके क़रीब बैठ गया।

“नादिया, मैं तुम्हारे लिए कुवैत से तोहफ़े लाया हूं, बहुत सारे तोहफ़े। मैं तब तक इंतज़ार करूंगा, जब तक तुम पूरी तरह ठीक होकर बिस्तर से उठकर घर नहीं आ जाती। मैंने वह लाल पाजामा भी ख़रीदा है, जो तुमने मुझे लिखकर मंगवाया था। हां, मैं उसे ले आया हूं।”

यह एक झूठ था, उस तनाव भरे लम्हे का जन्म दिया हुआ झूठ। मगर जब मैंने यह कहा, तो दिल में यूं लगा जैसे पहली बार सच बोल रहा हूं। नादिया एक लम्हे को कांप उठी, जैसे उसे करंट लगा हो, और उसने एक भयानक ख़ामोशी में डूबे अपने सिर को नीचे झुका लिया। और मैंने महसूस किया कि उसके आंसू मेरे हाथ की पुश्त को भिगो रहे हैं।

“कुछ तो कहो, नादिया। क्या तुम्हें वह लाल पाजामा नहीं चाहिए?”

उसने मेरी तरफ़ निगाह उठाई, जैसे कुछ कहना चाहती हो, मगर फिर रुक गई। उसने अपने दांत भींच लिए, और मुझे मानो कहीं बहुत दूर से आती उसकी आवाज़ दोबारा सुनाई दी,

“चचा…”

उसने हाथ बढ़ाया, उंगलियों से सफ़ेद चादर को ज़रा-सा उठाया और अपनी टांग की तरफ़ इशारा किया, वह टांग, जो रान के बिल्कुल ऊपर से काट दी गई थी।

मेरे दोस्त… नादिया की वह कटी हुई टांग मैं कभी नहीं भूल सकता। नहीं। और न ही वह ग़म, जो उसके चेहरे में पैवस्त होकर हमेशा के लिए उसके नक़्श-ओ-निगार में ढल गया है। उस दिन मैं ग़ज़ा के अस्पताल से बाहर निकला। मेरे हाथ में वे दो पाउंड थे, जो मैं नादिया को देना चाहता था, और अब वे मेरे हाथ में बे-आवाज़ ठिठोली की तरह दबे थे। शहर की सड़कें ख़ून की रंगत लिए जलती हुई धूप से सुर्ख़ हो रही थीं। और ग़ज़ा, मुस्तफ़ा…!

यह ग़ज़ा बिल्कुल नया था। हमने कभी उसे ऐसा नहीं देखा था। शुजाइया के उस नुक्कड़ पर लगे वे पत्थर, जहां हम बचपन में रहते थे, अब जैसे किसी और ही मानी में मौजूद थे। यूं लगता था जैसे वे सिर्फ़ इस ग़रज़ से रखे गए हों कि हमें कुछ समझा सकें। यही ग़ज़ा, जहां हमने सात साल शिकस्त के आलम में गुज़ारे, उसके नेक लोगों के साथ, अब एक बिल्कुल नई चीज़ महसूस हो रही थी। मुझे ऐसा लगा जैसे यह सब कुछ एक आग़ाज़ है। मैं नहीं जानता कि मैंने ऐसा क्यों सोचा। मगर जब मैं उस मुख्य सड़क पर वापस जा रहा था, तो यूं लगा जैसे वह सड़क सिर्फ़ एक शुरुआत है, एक लंबे, बहुत लंबे रास्ते की, जो सफ़द की ओर ले जाता है। ग़ज़ा की हर चीज़ में एक उदासी धड़क रही थी, मगर वह उदासी सिर्फ़ रोने की कैफ़ियत न थी। वह एक ललकार थी। बल्कि उससे भी बढ़कर, वह एक तरह से उस कटी हुई टांग की वापसी की जद्दोजहद थी।

मैं ग़ज़ा की उन सड़कों पर निकल आया, जो जलती हुई धूप से चकाचौंध हो रही थीं। मुझे बताया गया कि नादिया ने अपनी टांग उस वक़्त खो दी, जब उसने अपने छोटे भाई-बहनों को उन बमों और शोलों से बचाने के लिए उन्हें अपने ऊपर ले लिया था, जो उनके घर पर पंजे गाड़ चुके थे। नादिया ख़ुद को बचा सकती थी। वह भाग सकती थी, अपनी टांग बचा सकती थी। मगर उसने ऐसा नहीं किया।

क्यों?

नहीं, मेरे दोस्त, मैं सैक्रामेंटो नहीं आऊंगा, और मुझे कोई अफ़सोस नहीं। नहीं, मैं वह ख़्वाब भी पूरा नहीं करूंगा, जो हमने बचपन में एक साथ देखा था। ग़ज़ा से रुख़्सती के वक़्त जो धुंधला-सा एहसास तुम्हारे दिल में उठा था, वह नन्हा-सा एहसास, अब तुम्हारे अंदर एक जिन्न की सूरत इख़्तियार करेगा। उसे फैलना चाहिए। तुम्हें उसे ढूंढना चाहिए, ताकि तुम ख़ुद को पहचान सको, यहां, शिकस्त के बदनुमा मलबे के दरमियान…

मैं तुम्हारे पास नहीं आऊंगा। मगर तुम हमारे पास वापस आओ, ताकि नादिया की उस कटी हुई टांग से सीख सको कि ज़िंदगी क्या है, और वजूद की क़दर क्या है।

वापस आओ, मेरे दोस्त… हम सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं।