हिंदी साहित्य का संसार जितना विशाल दिखाई देता है, उतना ही सीमित भी है। हम अक्सर यह मान लेते हैं कि हिंदी में सब कुछ उपलब्ध है — विश्व साहित्य, समकालीन लेखन, क्लासिक ग्रंथ — परंतु वास्तविकता इससे भिन्न है। अनेक ऐसी किताबें हैं जो अंग्रेज़ी, रूसी, अरबी, फ़ारसी, फ्रेंच, स्पेनिश या कोरियाई भाषाओं में दशकों से उपलब्ध हैं, पर हिंदी में आज तक नहीं पहुँचीं।
यह सिर्फ भाषाई समस्या नहीं है। यह प्रकाशन-राजनीति का प्रश्न है।
अनुवाद क्यों रुक जाता है?
पहला कारण है — मेहनताने का प्रश्न। हिंदी प्रकाशन जगत में अनुवादक को अक्सर लागत की तरह देखा जाता है, सृजनकर्ता की तरह नहीं। अनुवाद को रचनात्मक श्रम नहीं, तकनीकी काम समझ लिया गया है। परिणाम यह होता है कि योग्य अनुवादक या तो अन्य भाषाओं की ओर चले जाते हैं, या फिर हिंदी में काम करना छोड़ देते हैं।
दूसरा कारण है — कॉपीराइट और रॉयल्टी को लेकर अस्पष्टता। प्रकाशक जोखिम लेने से बचते हैं। वे उन्हीं पुस्तकों पर दांव लगाते हैं जिनकी बिक्री की गारंटी हो। परिणामस्वरूप वैचारिक, प्रयोगधर्मी और राजनीतिक रूप से असुविधाजनक किताबें हिंदी में आने से रह जाती हैं।
तीसरा कारण है — भाषाई अहंकार। हिंदी को अक्सर आत्मनिर्भर भाषा की तरह प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन कोई भी भाषा अनुवाद के बिना विकसित नहीं होती। संस्कृत, फारसी, उर्दू, बंगाली, तमिल — सभी भाषाएँ अनुवाद के कारण समृद्ध हुई हैं।
अनुवाद सिर्फ भाषा-परिवर्तन नहीं
अनुवाद दरअसल सांस्कृतिक पुल है।
यह एक समाज को दूसरे समाज से जोड़ता है।
यह अनुभवों का आदान-प्रदान है।
यह विचारों का लोकतंत्रीकरण है।
जब हिंदी में विश्व साहित्य नहीं आता, तो हिंदी पाठक वैश्विक बहसों से कट जाता है। यह सांस्कृतिक अलगाव की स्थिति है।
अनुवाद और न्याय
अनुवाद का प्रश्न श्रम-न्याय से भी जुड़ा है। यदि अनुवादक को उचित मेहनताना नहीं मिलता, तो यह सिर्फ आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि बौद्धिक शोषण है। भाषा का विस्तार उन्हीं लोगों के श्रम पर खड़ा है, जिन्हें अक्सर नाम तक नहीं दिया जाता।
हिंदी में विश्व-स्तरीय साहित्य इसलिए नहीं आ पाता क्योंकि प्रकाशन-जगत अनुवादकों के साथ न्यायपूर्ण समझौता करने से बचता है। यह परंपरा तोड़ी जानी चाहिए।
आगे का रास्ता
हिंदी को विश्व-संवाद की भाषा बनाना है तो:
- अनुवाद को प्राथमिकता देनी होगी
- अनुवादकों को सम्मान और उचित भुगतान देना होगा
- कॉपीराइट को लेकर स्पष्ट और पेशेवर नीति बनानी होगी
- युवा अनुवादकों को प्रशिक्षित करना होगा
अनुवाद विलासिता नहीं है।
यह भाषा के अस्तित्व की शर्त है।

Leave a comment